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by I am what I am
भारत की सीमाओं पर होने वाले युद्ध हमेशा बंदूक और टैंक से नहीं लड़े जाते। कई बार असली लड़ाई उन कमरों में होती है, जहां नक्शे खुले होते हैं, फोन बंद होते हैं और कुछ नाम कभी कागज पर लिखे ही नहीं जाते। 1968 में बनी Research and Analysis Wing (R&AW) भारत की खुफिया एजेंसी है—जिसका काम विदेशों से जुड़ी रणनीतिक सूचनाएं जुटाना और राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े निर्णयों के लिए intelligence उपलब्ध कराना है।
R&AW की शुरुआती सबसे चर्चित भूमिकाओं में 1971 का बांग्लादेश मुक्ति संग्राम आता है। उपलब्ध ऐतिहासिक विवरणों के अनुसार एजेंसी ने पाकिस्तानी गतिविधियों से जानकारी जुटाने के साथ Mukti Bahini को training और support देने में भूमिका निभाई। इसी दौर ने भारत की covert intelligence capabilities को एक नया आकार दिया।
इसके बाद सिक्किम, म्यांमार और श्रीलंका जैसे मोर्चे आए। 1975 में सिक्किम के भारत में विलय से पहले वहां की राजनीतिक और सुरक्षा परिस्थितियों में R&AW की भूमिका के बारे में कई ऐतिहासिक स्रोतों में चर्चा मिलती है। श्रीलंका में तमिल militant groups को भारत के समर्थन और बाद में उससे दूरी बनाने का दौर भी R&AW के इतिहास का विवादास्पद अध्याय रहा।
लेकिन R&AW की असली दुनिया उन घटनाओं से कहीं बड़ी है जिनका नाम इतिहास की किताबों में लिखा गया। पाकिस्तान और चीन की गतिविधियों पर intelligence gathering, पड़ोसी देशों की राजनीतिक परिस्थितियों पर निगरानी, आतंकवाद और विदेशी खुफिया नेटवर्क से जुड़ी सूचनाएं—इन सबके बीच इसका काम चलता रहा।
जासूस की जीत अक्सर गोली चलने से पहले हो जाती है—जब दुश्मन की योजना का पता चल जाए। और उसकी सबसे बड़ी हार तब होती है, जब दुनिया को पता चले कि वह वहां था ही नहीं।